Thursday, November 29, 2018

सिब्बल बोले- केंद्र का रवैया यही रहा तो CVC और EC का भी यही हश्र होगा

सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा की याचिका पर सुनवाई शुरू हो गई है. सुनवाई के दौरान आलोक वर्मा के वकील फली नरीमन ने दलील दी कि कमेटी की सिफारिश पर ही सीबीआई डायरेक्टर नियुक्त किया जाता है. डायरेक्टर का कार्यकाल न्यूनतम दो साल होता है. अगर इस दौरान असाधारण हालात में सीबीआई निदेशक का ट्रांसफर किया जाना है तो कमेटी की अनुमति लेनी होगी.

लंच के बाद फिर से शुरू हुई बहस में दुष्यंत दवे ने कहा कि सीबीआई के फैसलों में सीवीसी या फिर सरकार जैसे किसी तीसरे पक्ष का दखल नहीं होना चाहिए. दवे के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से कपिल सिब्बल ने बहस की. सिब्बल ने कहा कि सीवीसी और सरकार एक्ट की अनदेखी और मनमानी कर सीबीआई निदेशक को छुट्टी पर नहीं भेज सकती. नियुक्ति और हटाने या निलंबन के आदेश सिर्फ सेलेक्शन कमेटी कर सकती है. ये मामला कमेटी के पास भेजना था. अगर ऐसे फैसलों और प्रक्रिया को हम मंज़ूर करेंगे तो सीबीआई की स्वायत्तता का क्या मतलब रह जाता है?  अगर कमेटी के अधिकार सरकार हथिया लेगी तो जो आज cbi निदेशक के साथ हो रहा है, वही कल CVC और ECI के साथ भी हो सकता है.

उन्होंने कहा कि ट्रांसफर में नियमों का पालन नहीं किया गया है. नरीमन ने कहा कि आलोक वर्मा की नियुक्ति 1 फरवरी 2017 को की गई थी. नियमानुसार उनका कार्यकाल पूरे दो साल तक है. अगर उनका ट्रांसफर ही करना था तो सेलेक्शन कमेटी करती.

कोर्ट में नरीमन ने सीवीसी का आदेश पढ़ते हुए कहा कि सीबीआई अधिकारी से सारी शक्तियां लेकर उनका ट्रांसफर कर दिया गया, जो नियमों के खिलाफ है. अगर सरकार को कुछ गलत लगता तो उसे पहले समिति में जाना चाहिए था. उनसे संपर्क करना चाहिए था.

नरीमन की दलील पर जज ने पूछा कि अगर सीबीआई डायरेक्ट को घूस लेते रंगे हाथ पकड़ लिया जाए तो क्या कार्रवाई करनी चाहिए. इस पर नरीमन ने कहा कि उन्हें फौरन कमेटी में जाना चाहिए.

मनीष सिन्हा की याचिका पर नरीमन ने पूछा कि एक मामला कोर्ट में दाखिल हुआ हो और सुनवाई के लिए नहीं आया हो तो क्या छपने पर कार्रवाई हो सकती है? इस पर कोर्ट ने कहा कि सुनवाई पर आने से पहले दाखिल हुई याचिका छापी जा सकती है. उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का ही फैसला है कि ये पब्लिश किए जा सकते हैं. भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी वर्मा ने छुट्टी पर भेजे जाने के केंद्र सरकार के निर्णय को चुनौती दी है.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ वर्मा के सीलबंद लिफाफे में दिए गए जवाब पर विचार कर सकती है. केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने वर्मा के खिलाफ प्रारंभिक जांच कर अपनी रिपोर्ट दी थी और वर्मा ने इसी का जवाब दिया है.

पीठ को आलोक वर्मा द्वारा सीलबंद लिफाफे में न्यायालय को सौंपे गए जवाब पर 20 नवंबर को विचार करना था किंतु उनके खिलाफ सीवीसी के निष्कर्ष कथित रूप से मीडिया में लीक होने और जांच एजेंसी के उपमहानिरीक्षक मनीष कुमार सिन्हा द्वारा एक अलग अर्जी में लगाए गए आरोप मीडिया में प्रकाशित होने पर न्यायालय ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए सुनवाई स्थगित कर दी थी.

पीठ द्वारा जांच एजेंसी के कार्यवाहक निदेशक एम नागेश्वर राव की रिपोर्ट पर भी विचार किए जाने की संभावना है. नागेश्वर राव ने 23 से 26 अक्टूबर के दौरान उनके द्वारा लिए गए फैसलों के बारे में सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट दाखिल की है.

जनहित याचिका पर भी पीठ कर सकती है सुनवाई

इसके अलावा, जांच एजेंसी के अधिकारियों के खिलाफ शीर्ष अदालत की निगरानी में स्वतंत्र जांच के अनुरोध वाली जनहित याचिका पर भी पीठ सुनवाई कर सकती है. गैर सरकारी संगठन कामन काज ने यह याचिका दाखिल की है. न्यायालय ने 20 नवंबर को स्पष्ट किया था कि वह किसी भी पक्षकारको नहीं सुनेगी और यह उसके द्वारा उठाए गए मुद्दों तक ही सीमित रहेगी.

सीवीसी के निष्कर्षों पर आलोक वर्मा का गोपनीय जवाब कथित रूप से लीक होने पर नाराज न्यायालय ने कहा था कि वह जांच एजेंसी की गरिमा बनाए रखने के लिये एजेंसी के निदेशक के जवाब को गोपनीय रखना चाहता था. उपमहानिरीक्षक सिन्हा ने 19 नवंबर को अपने आवेदन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, केन्द्रीय मंत्री हरिभाई पी चौधरी, सीवीसी के वी चौधरी पर भी सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच में हस्तक्षेप करने के प्रयास करने के आरोप लगाए थे.

Tuesday, November 13, 2018

आपके काम की 10 सबसे महत्वपूर्ण बातें

निश्चित रूप से आप अपनी कार को महत्व देते होंगे! अपनी कार को चलाते हुए आपको जो गर्व और आनंद का अनुभव होता है, आपकी अपनी कार जिसे आपने महीनों के विचार-विमर्श, रिसर्च और बचत के बाद खरीदा है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता. इसलिए उस पर यदि छोटी-सी खरोंच भी लग जाए तो आपको पीड़ा होती है. उससे कहीं छोटी-सी भी टक्कर लग जाए तो आपकी कई रातों की नींद छिन जाती है. और ईश्वर न करे लेकिन अगर आपकी प्रिय कार कहीं दुर्घटना का शिकार हो जाए तो क्या होगा! इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल आपके मन में उठता है कि, 'क्या मैं अपनी कार की सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय कर रहा हूं?'

कार बीमा (या मोटर इंश्योरेंस) एक ऐसी छतरी है जो दोनों तरह से बचाव करती है-किसी अनजान जोखिम से आपकी कार को और किसी आकस्मिक घटना की स्थिति में आपको हो सकने वाले किसी नुकसान से. कार के लिए होने वाले बीमा कवर में बीमित कार, बीमित पार्टी और थर्ड पार्टीज (दूसरे वाहन और लोग) शामिल होते हैं. इसलिए किसी को जो प्रीमियम देना होता है वह कई चीजों पर निर्भर करता है, जैसे कार का मूल्य, बीमा कवरेज का प्रकार, वाहन का वर्गीकरण आदि.

भारत में कार बीमा अनिवार्य है. आमतौर पर लोग ऑनलाइन जाकर विवरण पढ़ने और सही कार बीमा चुनने की तकलीफ नहीं उठाना चाहते. ऐसा लगता है कि यह महज एक औपचारिकता है, जिसे बंद कर देना चाहिए, ठीक है!  लेकिन आपको यह आभास नहीं होगा कि यह आपके द्वारा हो सकने वाली सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है. यहां हम आपको 10 ऐसे बिंदुओं के बारे में बताते हैं जो आपको मोटर इंश्योरेंस के बारे में जानना ही चाहिए, अथवा आपके पास संकट में फंसने के दौरान एक निरर्थक योजना ही होगी:

1. जितना ज्यादा डिडक्टिबल होगा, प्रीमियम उतना ही कम होगा-  कार बीमा कंपनियां अपनी कीमत का निर्धारण इस आकलन के आधार पर करती हैं कि किसी आकस्मिक घटना की स्थिति में उन्हें कितना भुगतान करना पड़ सकता है. हालांकि, आप यदि अपने डिडक्टिबल राशि को बढ़ाने पर सहमत हुए तो वह राशि घट जाएगी जो बीमा कंपनी आपको क्लेम पर देती है, ऐसे में आमतौर पर कंपनियां कम प्रीमियम ऑफर करती हैं. आप यदि डिडक्टिबल का भुगतान वहन कर सकते हैं तब तो ठीक है, अन्यथा इस विकल्प को चुनने से बचें.

2. जी हां, आप अपने नो क्लेम बोनस को ट्रांसफर कर सकते हैं (NCB)- आपने अपनी कार को अपग्रेड किया? आप अपने संचित एनसीबी को अपनी नई कार में ट्रांसफर कर सकते हैं. क्या आप नई बीमा कंपनी से जुड़ चुके हैं? फिर से आप अपने मौजूदा एनसीबी को नई कंपनी के कार बीमा पॉलिसी में ट्रांसफर कर सकते हैं. यह बहुत सिम्पल है!

3. जीरो डिप्रिशिएसन कवर के बारे में जानें- जीरो डिप्रिसिएशन कवर आपका सबसे सुरक्षित दांव होता है. इस तरह के बीमा कवर में डिप्रिसिएशन यानी मूल्य ह्रास को शामिल किए बिना पूर्ण निपटान किया जाता है. इसलिए यदि कभी आपकी कार किसी दुर्घटना का शिकार हो जाती है तो जीरो डिप्रिसिएशन कवर से यह सुनिश्चित होता है कि आपको इससे हुए नुकसान के लिए अपनी जेब से कुछ नहीं देना होगा, दूसरी तरफ, किसी सामान्य कार बीमा में डिप्रिसिएशन की गणना की जाती है और इससे आपको निपटान के बाद मिलने वाली राशि काफी घट जाएगी. हां, यह सच है कि जीरो डिप्रिसिएशन कवर के लिए प्रीमियम किसी रेगुलर कवर के मुकाबले ज्यादा होता है, लेकिन यह आपको होने वाली परेशानियों से ज्यादा तो नहीं?